३१ जुलाइ, १८८० को बनारस के पास एक छोटे गाँव लमही में एक बालक का जन्म हुआ| यह  बालक, जिसका नाम धनपत राई श्रीवास्तव रखा गया, आगे चल कर मुंशी प्रेमचंद के नाम से दुनिया में मशहूर हुआ|

प्रेमचंद बचपन से ही कहानियों की दुनिया में खो जाना पसंद करता था| घर के पास पान वाले के यहाँ जाकर उससे तिलिस्म-ए-होशरबा की कहानिया सुनना उस बालक को  पसंद था| मगर समय का खेल देखिये, चंद वर्षों बाद, सन १८९७ तक वह अपने माता पिता, दोनो को खो चूका था| समय की यह त्रासदी प्रेमचंद को अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने से रोक न सका| अपने चाचा के साथ गोरखपुर में रहते वक्त उन्होने अपना पहला लेख लिखा| यह लेख कभी कहीं भी नहीं छपा| अतः वह कोई पढ़ ना पाया| मगर ऐसा कहा जाता है कि कटाक्ष से भरा इस लेख उन्होने अपने चाचा के बारे में, जो उन्हे ज़्यादा कहानिया पढ़ने से रोकते, उनके बारे में उनसे बदला लेने के लिए लिखा था| प्रेमचंद यूँ तो पढ़ाई में ज़्यादा अच्छा ना कर पाए, पर अपनी मेहनत से, अपनी कहानियों के बल पर अध्यापक बन गये| बड़े लोगों के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगे| 

१९०३ में प्रेमचंद ने अपना पहला लघु उपन्यास लिखा, जिसका नाम “देवस्थान रहस्या” था| यह उपनयास मंदिरो के पंडितों में भ्रष्टाचार का खुलासा था| यह उपनयास बनारस के साप्ताहिक उर्दू अख़बार, आवाज़-ए-खल्क में अक्टूबर १९०३ से लेकर फेब्रुअरी १९०५ तक कई भागों में छपा| कानपुर में रहते समय वह दया नारेन निगम से मिले जो ज़माना पत्रिका के संपादक थे| जिसके  फलस्वरूप १९०५ से १९०९ तक उनके बहुत लेख ज़माना पत्रिका में छपे| १९०७ में ज़माना में उनकी पहली लघु कहानी सोज़-ए-वतन भी छपी| १९०९ में यही कहानी उनके अँग्रेज़ सरकार की आँखों में आने की वजह बनी| अंग्रेजी सरकार ने उनके घर में घुस कर सोज़-ए-वतन की पाँच सौ कापियाँ जला दीं| १९१४ में प्रेमचंद जी ने हिन्दी लेखन की ओर रुख़ किया| इस समय तक वे एक स्थापित उर्दू लेखक बन चुके थे| १९१९ तक प्रेमचंद जी के चार लघु उपन्यास छप चुके थे|

१९२१ में प्रेमचंद जी ने गाँधी जी द्वारा चलाई गयी असहयोग आन्दोलन की शुरूआत के लिए गोरखपुर में रखी गयी मीटिंग में भाग लिया| इस मीटिंग में गाँधी जी ने सभी भारतीयों को, जो अँग्रेज़ी सरकार के यहाँ नौकरी कर रहे थे, इस्तीफ़ा देने का आग्रह किया| प्रेमचंद पर उनके दो बच्चों तथा उनकी गर्भवती पत्नी का आर्थिक उत्तरदायित्व था, फिर भी उन्होने सोच विचार के बाद अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया और बनारस लौट गये| नौकरी छोड़ने के बाद प्रेमचंद को बहुत आर्थिक कठिनाइयों से गुज़रना पड़ा, जिसका समाधान करने के लिए १९३४ में वे बम्बई चले आए| बम्बई आने के बाद उन्होने पटकथा लेखन का काम शुरू किया| इस दौरान उन्होंने मजदूर फिल्म की कहानी भी लिखी| इस फिल्म से प्रेरित होकर उनकी फैक्ट्री के कर्मचारियों ने वेतन ना मिलने पर धरना दिया, जिस कारण उन्हे जागरण का प्रकाशन बंद करना पड़ा व फैक्ट्री भी बंद करनी पड़ी|

प्रेमचंद की उपन्यासों में समाज की रौद्र सच्चाई थी| वे अमीरों के हाथ ग़रीबों और मध्यम वर्ग के लोगों का धर्म के नाम पर शोषण के बारे में लिखते थे| वे अपनी लेखन से समाज में जागरूकता का पाठ फैलाना चाहते थे| प्रेमचंद अपनी कहानियों से भ्रष्टाचार, बल-विधवा, वेश्यावृत्ति, सामंती व्यवस्था, गरीबी, उपनिवेशवाद और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन पर लोगों को जागरूक करने में विश्वास करते थे। अपने अंतिम दिनों में उन्होने ग्रामीण जीवन की व्यस्तताओं पे ध्यान देते हुए अपनी कहानियों को वैसा ही रूप दिया| इसका एक उदाहरण उनकी उपन्यास गोदान (१९३६) में है| प्रेमचंद साहित्या की दुनिया के बहुत बड़े नाम हैं, जो अपने काम से समाज के लिए एक प्रतिबिंब रहे हैं| आज भी उनके लिखे लेख वे उपनयास महत्त्वापूर्ण माने जाते हैं| उन्होने हिन्दी साहित्य में अपनी छाप इस तरह छोड़ी है की एक मज़बूत पाठक आधार उनके काम से बहुत पहले से ही जुड़ गयी थी| आज भी इन पाठकों के लिए प्रेमचंद जी के लेख ही जीवन का प्रतिबिंब हैं|

प्रेमचंद द्वारा रचित प्रमुख हिंदी व उर्दू उपनयास व लेखों की सूची कुछ इस प्रकार है:

हिन्दी उपनयास:

देवस्थान रहस्या, प्रेमा, किशणा, रूठी, वरदान, सेवा सदन, प्रेमश्रम, रंगभूमि, निर्मला (नॉवेल), आदि|

उर्दू उपनयास:

हंखुरमा- ओ-हम सवाब, सोज़-ए-वतन, जलवा-ए-ईसर, बेज़ार-ए-हुस्न, गोशा-ए-आफियत, चौगन-ए-हस्ती, निर्मला, आदि|

लघु लेख:

अदीब की इज़त, दुनिया का सबसे अनमोल रतन, बड़े भाई साहब, बेटी का धन, सौत आदि|

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